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Saturday, 16 June 2012

वक़्त रुकता नही

ना मुहब्बत ना दोस्ती के लिए
वक़्त रुकता नही किसी के लिए
दिल को अपने सज़ा न दे यूं ही
इस ज़माने की बेरुखी के लिए
कल जवानी का हश्र क्या होगा 
सोच ले आज दो घड़ी के लिए 
हर कोई प्यार ढूँढ़ता है यहाँ 
अपनी तनहा सी ज़िंदगी के लिए 
वक़्त के साथ साथ चलता रहे 
यही बेहतर है आदमी के लिए ||

Wednesday, 6 June 2012

भूल गए


याद  नहीं  क्या  क्या  देखा  था  सारे  मंज़र  भूल  गए , 
उस  की  गलियों  से  जब  लौटे  अपना  भी  घर  भूल  गए ,
खूब  गए  परदेस  की  अपने  दीवार -ओ  - दर  भूल  गए ,
शीश -महल  ने  ऐसा  घेरा  मिट्टी  के  घर  भूल  गए ,
तुझ  को  भी  जब  अपनी  कसमें  अपने  वादे  याद  नही  ,
हम  भी  अपने  ख़्वाब  तेरी  आँखों  में  रख  कर  भूल  गए ,
मुझ  को  जिन्होंने  क़त्ल  किया  है  कोई  उन्हें  बतलाये  "देवा " ,
मेरी  लाश  के  पहलू  में  वो  अपना  खंजर  भूल  गए ,
खंजर पर लगे खून के छीटों में हमारे करम धुल गए ,
मरना तो है सबको लेकिन हम तो जीना ही भूल गए ||

Tuesday, 5 June 2012

UMANG ( उमंग )

उठती सी उमंग है ज़िन्दगी में रोज नयी,
दिल में रोज एक बोझ सा रह जाता है ,
बेचैन सी निकल जाती है रात आँखों तले से,
उल्जे पन्नों  को सुल्जाने में भी डर सा लगता है,
सब जान कर भी नासमझ बना बैठा हु मैं,
इतना सोच कर भी वक़्त कम सा लगता है, 
डूब जाना चाहता हूँ में उजाले की गहराई में,
पर आँख खोल देखने का भी मन नही करता है,
बैठा रहूँ उस  राह पर जीवन भर ,
जिस  राह में साथ आपका अच्छा सा लगता है।।

Wednesday, 23 May 2012

किसी की याद आती रही

आज  गुमसुम  हवाएं लोरियां सी सुनाती रही ,
मेरी तन्हाई  फिर मुझे सताती रही ,
सन्नाटों को चीरती ,
किसी की याद आती रही ।

मेरी कलम  सफ़ेद  कागच  पर ,
लिख  लिख  कुछ  मिटाती  रही ,
सूखे से लबों पर जैसे 
कोई बात  आती सी रही,
किसी की याद आती रही ।

बीते हुए पल  कभी ना  लौटेंगे,
ना ही लौटेंगे दूर जाने वाले,
दोपहर में तेज  हवाएं गली में ,
जैसे धूल  उड़ाती सी रही,
किसी की याद आती रही ।

सूखे पत्तों की सरसराहट मुझे ,
किसी की याद  दिलाती रही ,
मेरी उँगलियाँ रेत  पर  जैसे ,
मेरी किस्मत  लिखती रही मिटाती  रही,
किसी की याद आती रही ।।



Monday, 9 April 2012

उम्मीद

I heard few lines few days before

उम्मीदों वाली धूप, Sunshine वाली आशा ....

बस यही सोच कर कुछ याद आ गया ....
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शाम का सूरज देखे अब तो अरसा हो चला है ,
चाँद भी देखा नही चांदनी को देखे अरसा हो चला है,
देर हो जाती है आज कल घर आते आते ,
थके होते है इतने के कैसे करे अपनों से बातें,
सवेरे की धूप भी अब तो आँखों में चुबती सी लगती है,
रात को चलती ठंडी हवा भी नींद कहाँ ला पाती है ,
बारिस के पानी से भी डर सा लगा रहता है,
नीर निगलते भी स्वाद बदला सा लगता है ,
अब तो बस यही उम्मीद सी रहती है ,
यूँ ही  ज़िन्दगी कटती सी लगती है ।।

What are I waiting for ?
another day another dawn.
some day I have to find a new way to peace.

Saturday, 24 March 2012

रोना छोड़ दिया

ज़िन्दगी अक्सर कुछ कहना भूल जाती है ,
रास्तों पर पड़ी धूल भी हवा से उड़ जाती है ,
आँखों में पड़ती उन धूल से ,
सपने देख की हुई भूल से ,
मैंने आज खुल कर बोल दिया ,
यही की अब मैंने रोना छोड़ दिया ।।

कुछ कहे ना कहे ये ज़िन्दगी
सबक सारे ये दे जाती है,
हम भी रहे ना रहे यहाँ
सिमटी हुई सी यादें रह जाती है,
यादों के बहते कारवां से ,
लिपटी ज़िन्दगी की साँसों से,

मैंने आज खुल कर बोल दिया ,
यही की अब मैंने रोना छोड़ दिया ।।

यारों की यारी से खुशी मिल जाती है,
हंसी मजाक में कभी मंजिल मिल जाती है,
साथ चले उन मस्ती के पलों से,
अभी भी बची हुई उस जुम्बिस से,

मैंने आज खुल कर बोल दिया ,
यही की अब मैंने रोना छोड़ दिया ।।

अब भी  वो बदरी वहां बरस जाती है,
पर हमे ना पाकर उदास लौट जाती है,
सीख इस बंजर जमीन से,
सूखे  काटों की चुभन से ,

मैंने आज खुल कर बोल दिया ,
यही की अब मैंने रोना छोड़ दिया ।।

नम साँसों से कभी आह आ जाती है,
जब फिजा तरसा कर चली जाती है ,
उन सर्द हवाओ की ठिठुरन से,
जलती लकड़ियों के धुएं से,

मैंने आज खुल कर बोल दिया ,
यही की अब मैंने रोना छोड़ दिया ।।






Sunday, 18 March 2012

Life 2

    After having to some experience of real life there is no peace of mind seems far away. So I just prefer stillness now. In order to experience stillness we need to empty our minds.


       This  is a very difficult task. It is easily   said, but so difficult to do.  We are always full of so much. We are either full of our own thoughts  or full of our  own prejudices. We are full  of  what  others  have  taught  us  or  what has been filled into our brain. There is no space.  The  mind is filled to the brim.  And  if we  are   filled to the brim, how can we find stillness within us?


         To empty our mind is actually th e process of sadhana. It is important to understand that the one, who is doing the emptying, is himself, made up of what he is trying to empty. 


      Emptying itself is neither a conscious process nor even an unconscious process. ‘Empty itself’ simply means to understand the concept. It is not as if I can sit down in one place – like a technique – and say, ‘I am emptying myself.’ This is not possible. But the concept should be in my mind, so that as I live in this world and communicate with the people around me, the process of emptiness begins to work in me.


       It starts like this, to give an example of what I mean. I see somebody and I am upset with that somebody for something that he has done to hurt me in the past. When I meet that person today, after 10 years, how do I meet him? Am I meeting him with the same feeling I have carried with me all those years? Then I am not emptying myself. On the other hand, I could say, ‘ OK, ten years have passed. Hopefully, this man has changed because minds can change. After all, he only hurt me. Maybe he has not hurt hundreds of other people. 


       So it could be my fault. We only need to keep all these things clear that which thoughts are destroying our stillness. Here I think as per conclusion  stillness is the  only thing which can give us a proper peace of mind.